July 29, 2024
राही थे वो अनजान राहों पर पलट कर देखना शयद भूल गए पर स्याही से एक पुल बाँधी थी जिसको कभी वो मिटा न सके | किरणों के साथ वो दिल से बेहती कागज़ की खुशबू में कहीं लुप्त हो जाती डूबते सूरज को देख वह आह भरती चांदनी की नूर से कभी वो लिखती | बिखरे हुए शब्दों को हाथों से बटोरती पंखुड़ियों की धाराओं से वो माला बुनती जब स्याही बेहती उसकी कलम से पँखो की बौछार होती किसी के दिल में | स्याही जो कलम से निकलती कहीं तो सजती और सँवरती जूनून कभी नहीं मरती अगर वो बंद भी रहती किताबों में! © 2016 Geetha Jayakumar. All rights reserved.
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