Geetha Jayakumar

A Computer Programmer By Profession, Homemaker by Choice and Poetess by Passion

लालिमा स्याही की! 


लालिमा स्याही की! 


July 29, 2024

राही थे वो अनजान राहों पर 
पलट कर देखना शयद भूल गए 
पर स्याही से एक पुल बाँधी थी 
जिसको कभी वो मिटा न सके | 

किरणों के साथ वो दिल से बेहती 
कागज़ की खुशबू में कहीं लुप्त हो जाती 
डूबते सूरज को देख वह आह भरती 
चांदनी की नूर से कभी वो लिखती | 

बिखरे हुए शब्दों को हाथों से बटोरती 
पंखुड़ियों की धाराओं से वो माला बुनती 
जब स्याही बेहती उसकी कलम से 
पँखो की बौछार होती किसी के दिल में | 

स्याही जो कलम से निकलती कहीं तो सजती और सँवरती 
जूनून कभी नहीं मरती अगर वो बंद भी रहती किताबों में! 

© 2016 Geetha Jayakumar. All rights reserved.


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